Monday, September 10, 2007

गरमी का हक

मई की सुबहे थी घडी में १० बजे थे गर्मी अपनी चरम सीमा पर थी। सूरज धरती पर ऐसे बरस रहा था जैसे कोइ पुराना बैर निकाल रहा हो। पानी जमीन के लिए पराया हो गया था नामी ने हवा से नाता तोड़ लिया था, शायद इसीलिये शरीर का पानी पसीना बन हवा की प्यास बुझा रहा था। लेकिन फिर भी हवा शुष्क थी हवा में धुल ऐसे उड़ रही थी जैसे सालों बाद धरती की क़ैद से आजाद हुई हो। गर्मी ऎसी थी की सागर को भी निर्जलन हो जाये। ऎसी गर्मी में घर से निकलना मौत को गले लगाने के बराबर लगा रहा था पर क्या करता आख़िर नौकरी पर भी तो जाना था।

घर से निकलते ही मैं और मेरे दोस्त ने रिक्शा ढूँढना शुरू किया। घर से थोडा आगे एक पेड की छाया में एक रिक्शा खडा था जिस पर रिक्शे वाला सो रहा था उसे देखकर लग रहा था की वो गर्मी नही वातानुकुलित कमरे में सो रहा हो।

"देख यार कैसे सो रहा है इतनी गर्मी में", मैं अपने दोस्त से बोला

"इन लोगो को आदत होती हैं यार, चल पूछते हैं की चलेगा या नही।"

मैं रिक्शा के पास गया और बोला,"रिक्शा, सेक्टर ५९ चलेगा"।

"हाँ साहिब बैठो"

"कितना लेगा "

"जितना रोज लगता हैं साहिब"

"बता तो कितना लेगा "

"३० रुपिया"

"रोज तो २० लगता हैं आज ३० क्यों ? २ लोगो का ज्यादा से ज्यादा २५ रुपिया।"

"साहिब अगर गर्मी तो देखो रिक्शा खीचने में जान निकल जाती हैं, गलत थोड़े ही माँगा है। "

"गर्मी शुरू होते ही तुम्हारे नखरे शुरू हो जाते है, अगर गर्मी में ज्यादा लेते हो तो सर्दी में कम क्यों नही लेते, २५ लेटा है तो बोल नही तो मैं दूसरा देखता हूँ। "

"ठीक हैं साहिब बैठो वैसे गलत नही माँगा रह हूँ मैं गर्मी का किराया यही है"।

ऑफिस पहुंचकर जब मैं २५ रूपये दिया तो पैसे लेते हुये रिक्शा वाले ने ऐसे देखा जैसे मैंने उसे लूट लिया हो।
मैं सोचा रहा था कि जितने में बात हुई थी उतने लेकर भी ऐसे जता रहा है जैसे एहसान कर रहा हो।

ऑफिस पूर्णतः वातानुकूलित था। अन्दर आकर अपनी कुर्सी पर बैठा और चेन कि सांस लेकर बोला "शुक्र हैं कि यहाँ ठंडा हैं नही तो गर्मी मेरी जान ही निकाल देती"। मैं अपना कंप्यूटर चलाकर इन्टरनेट पर अपनी चिट्ठियाँ पढने लगा और फिर उठ कर चाय लेने चला गया। चाय लाकर रोज कि तरह अपने काम में लग गया। शाम के ७ बजे थे, मैं अपनी घडी देखा और साराकाम समेटने लगा। " दुकान बंद कराने का समय हो गया है, चल निकल ले", मन ही मन ये बुदबुदाते हुये मैंने अपना कंप्यूटर बंद किया और अपनी दराज में ताला लगा करा मैं घर को निकल गया। ऑफिस के गेट पर दोस्त इंतज़ार करा रह था, वो घर जाने के लिए रिक्शा कर चुका था। मैंने पूछा कितने में किया तो वो मुस्कुराया और रिक्शा में बैठ गया। मैं भी उसके बगल मैं बैठ गया और बोला भैया चलो। घर पहुंचकर मैंने ताला खोला और सीधा अपने बिस्तर पर जाकर ऐसे गिरा जैसे कटा हुआ पेड हो।

थोड़ी देर में मेरा दोस्त मेरे कमरे में आया और बोला की चल बाजार में घूम कर आते है।

"अबे पागल है क्या ? गार्मी देख। " मैंने उसे आश्चर्ये और झुन्झुलाहट से घूरा और बोला , " यहाँ खडे होने की ताक़त नही हैं और तू घूमने की बोल रहा है। "

" अरे यार गार्मी है तो क्या हुआ, बाज़ार का मौसम मस्त होगा और कौन का पैदल चल कर जाना है, रिक्शा कर लेंगे"

"नही यार , गार्मी ने बुरी तरह थका दिया है। और फिर कल सुबहे सुबहे ऑफिस जाना है। "

"अबे गर्मी ने कैसे थकाया तुझे, पूरा दिन वातानुकूलित ऑफिस में था और बाद में रिक्शा में आया।"

"यार आने जाने में तो थका ना। कितनी गर्मी थी जब ऑफिस गए थे।"

"अबे तो रिक्शा में बैठकर गया था भाई तू। "

"अच्छा अगर तू कंपनी से ऑफिस आने जाने का टैक्सी का किराया दिलवा दे तो तू जहाँ कहा करेगा चला करुंगा।"

"आने जाने का किराया क्यों भाई ?", दोस्त ने उत्सुकता से पूछा।

"यार एक तो आने जाने मैं इतना थकते हैं और फिर वहाँ काम भी करना होता हैं तो आने जाने कि थकान कुछ तो मिलना चाहिऐ ना। मेरे हिसाब से गर्मी में आने जाने का किराया ना देना हमारा हक छीनने के बराबर है। "

"वाह ! वाह ! ये देखो नवाब को, आने जाने का किराया चाहिऐ, और ना देना हक छीनना ऐसे बोल रहे है जैसे हमेशा दुनिया का भला करते आये हो और किसी का हक ना छीना हो। "

"अबे मैंने किसका हक छीना भाई", उसकी बात से चकित होकर मैंने उससे कहा,"कोई भी घटना बता दे जब मैं किसी का हक मारा हूँ। "

"तेरे हिसाब से गर्मी मैं किराया ना देना हक छीनना हैं, क्यों ?" मेरे दोस्त ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा।

"हाँ", मैंने पूरे विश्वास से जवाब दिया।

"और तुने कभी किसी का हक नही छीना ?"
ये पूछाते हुए उसकी एक भौंह चढ़ी हुई थी, आवाज में हास्य और कुटिलता का मिश्रण था। उसे देख मैं थोडा हिचकिचाया और बोला,"नही छीना"।

"तो आज सुबहे तुने क्या किया था ?"

"मैं समझा नही, क्या किया था मैंने ?"

"तुने उस रिक्शा वाले को क्या कहा था जब वो गर्मी कि वजह से ज्यादा पैसे माँग रहा था। तेरे हिसाब से चालू तो तुने भी तो उसका हक छीना। तो जैसा तुने दुसरो के साथ किया दुसरे वैसे ही तो करेंगे ना तेरे साथ "ये कह वो मुझ पर हँसा और बोला "पहले खुद को सही कर फिर दुनिया से हक माँगना"।

उसकी
बात सुन कर मुझे बुरा लगा पर वो सही था। मैं जब उसकी बात पर सोचा तो मुझे लगा कि हाँ मैं भी तो गलत ही हुँ। में बिस्तर से खड़ा होकर चलने की तयारी करने लगा, पर उसकी बात मेरे कान में हथोडे कि तरह बज रही थी। मुझे ऐसा महसूस हो रह था जैसे किसी ने मेरे मुहं पर जोरदार तमाचा मारा हो। अजीब सी शर्मिंदगी का एहसास पैदा हो गया था मेरे अन्दर।
"चल बाजार घूम कर आते हैं ", ये कह कर मैंने बात बदलने कि कोशिश करी पर मैं अन्दर ग्लानी के भंवर में फँस चुका था।

3 comments:

himanshu said...

sir mein to pehle se hi fan tha aapka ...ye kahani lik ke to aapne paani paani kar diya...good goin

Anonymous said...

bahut garmi saale tere khoon mein.....badi kahaniyan likh raha hai garmi i....saale noida ke rikshewaale.....

Ravi said...

paseene chudaa diye aapne to... window sir aapki jai ho !!!