Tuesday, January 6, 2009

जुदाई

ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी न रही, मौत न जाने क्यों करीब हो गई,
बैठे बिठाये ऐसे जीवन बिखेरा मैंने, कि मुझ पर मेरी तकदीर रो गई।

जिनकी मुस्कराहट से होती थी सुबहे, जिनके आँचल मैं ढलती थी शाम,
दर्द दिया उनको ऐसा मैंने की, छलक पड़े उनकी अश्को के जाम।

बस अपनी हाथ पर रहा मैं, और अपनी मुर्खता पर मुस्कुराया,
बार-बार दिल तोडा उनका, की अब दूर हो गई उनके प्यार की छाया।

अपनों के दूर होने का दर्द, शायद आज मैं समझ पाया हूँ,
लेकिन अब इतनी देर हुई हैं कि, आज मैं अपनी छाया हूँ।

हाथ जोड़ माफ़ी मांगता हूँ तुमसे, मैं बहुत तुम्हें रुलाया हूँ,
दूर न जा तू मुझे छोड़कर, आज मैं बहुत पछताया हूँ।

आज ये वादा करता मैं तुझसे, अब दुबारा ये गलती न होगी,
दूर न जा तू मुझे छोड़कर, क्यूंकि तेरे बिन ज़िन्दगी, ज़िन्दगी न होगी।